बात शुरू होती है जब मैं उसके घर थी। उन दिनों से पहले जब मैं चली जाने वाली थी अपनी नयी नौकरी के लिए । सुबह के छह बजे थे, मेरा अलार्म बजता है और मुझे एहसास होता है कि - मुझे जाना है.. ! मैं उस रविवार को जाने वाली थी और वो दिन गुरुवार था। सोने से पहले मैंने उसका चेहरा गौर से देखा था - मैं आखिरी बार देखना चाहती थी क्योंकि मुझे पता था, कि इसके बाद सब कुछ जैसा था वैसा नहीं रहने वाला। मुझे पता था मैं उसे बहुत याद करूंगी - पर इस हद तक करूंगी मुझे पता नहीं था। ये सब नहीं होना चाहिए था।
उस दिन से आते हैं आज में। उसने कहा कि वो जा रहा है एक लड़की को मिलने। मैं खुश थी, उसके लिए खुश थी। लेकिन कभी-कभी ऐसा वक्त क्यों आता है जब मेरा दुख उसके सुख पर ज़्यादा हावी होने लगता है। बस ये चीज़ तुमसे सही नहीं जाती। तुम सोचने लगते हो हर वो चीज़ के बारे में जो तुमने साथ की थी - खो जाते हो हर वो सवाल में जो तुमने जवाब दिए थे उसको - क्योंकि जो भी था तुम्हारे बीच वो नहीं हो सकता था। सवाल आते हैं और तुम भी अपना तवाज़ुन गंवा बैठते हो, और ये सिलसिला चलता रहता है।
तुम ये किसीको कह भी नहीं सकते क्योंकि “यह तुम्हारा रहस्य है और किसी को इसके बारे में पता नहीं चलना चाहिए”। तुम्हें ये चीज़ें इतनी खलती हैं कि तुम सब छोड़-छाड़ कर एक गाड़ी चलाने निकल जाते हो- और किस्मत भी देखो तुम्हारे अंदर जो तूफ़ान था वही बाहर छलक रहा है। तेज़ हवाएं, बिजली, बारिश, और अंधेरा। तुम सोचते रहते हो वही उन सारे “‘क्या होगा अगर’ वाले परिदृश्य” को और शायद सिसक-सिसककर रोते भी हो। तुम्हें और दूर गाड़ी चला के जाना है पर बात ऐसी है कि पेट्रोल खत्म होने को है और तुम्हें वापस घर भी जाना है। तो तुम ठहर जाते हो एक पार्क में जिससे तुम पूरा ऑस्टिन डाउनटाउन देख सकते हो। वहाँ पता नहीं कितना वक्त बीत जाता है। तुम सुनते रहते हो जय सिंह के पॉडकास्ट को स्पॉटिफाई पे, और उसका हर एक शब्द तुम्हें वापस रोने पे मजबूर कर देता है। लेकिन इस सब के बीच में काफी बार ऐसा वक्त आता है कि कि तुम सोचते हो कि तुम अपने आप को संभाल लोगे - तुम देखते तो अपने विंडशील्ड पर गिरती उन पानी की बूंदों को और सहम जाते हो - चाहते हो कि वक्त ठहर जाए बस उस जगह जहाँ तुम अभी होना चाहते हो। लेकिन ये सब मुमकिन कहाँ और फिर ये ज़ालिम ख़याल वापस शुरू हो जाते हैं। सब बुरा लगने लगता है उस वक्त - सोचते हो कि ऐसा सब क्यों हुआ और इतने कम समय में एक इंसान तुम्हारे लिए इतना अहम कैसे बन सकता है। और दूसरी बात ये है कि ये सब हुआ कैसे? और कब हुआ? और ये सब सोचने के बाद तुम्हें ये एहसास होता है कि शायद अच्छी ही बात है कि तुम अलग शहरों में रहते हो। वरना ये सब झेलना कुछ ज़्यादा ही मुश्किल हो जाता।
अब इस कहानी को मैं एक गंवाया हुआ मौका बोलूं, पाँव पे कुल्हाड़ी मारना बोलूं या मोहब्बत का टुकड़ा बोलूं क्या ही फर्क पड़ता है। क्योंकि ये जो हुआ वो है - और इसके लिए सबसे उत्तम शब्द है “அந்தாதி காதல்”।